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सिर्फ एक रूपये में पाकिस्तान चित्त !

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सिर्फ एक रूपये में पाकिस्तान चित्त ! डिप्लोमैसी का यह अबतक का सबसे बड़ा सर्जिकल स्ट्राइक था।  यकीन तो मुझे भी नहीं होता लेकिन सच तो यही है। महज एक रुपया फीस लेकर भारत के वकील हरीश साल्वे ने पाकिस्तान की डिप्लोमैसी को  धूल चटा दी है। पिछले 50 वर्षों में यह पहला मौका है जब पाकिस्तान के हॉक डिप्लोमैसी को भारत की मोदी सरकार ने करारा जवाब दिया है। पाकिस्तान में मीडिया,ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट ,फॉर्मर डेपलमैट्स ,साबिक जज ,हॉकिंस जनरल एक दूसरे को गरिया रहे हैं "आसमां जहांगीर पाकिस्तानी हुकूमत से पूछती हैं ,मूर्खों ! कुलभूषण को कौंसिलर एक्सेस क्यों नहीं दिया ? कल हम दुनिया से क्या शिकायत करेंगे। एक डिप्लोमेट्स पूछता है आखिर इंटरनेशनल कोर्ट में गए क्यों ?अपने पैरों पर पाकिस्तान ने खुद कुल्हाड़ी मारी है।  पहलीबार पाकिस्तान को एक जोर का झटका लगा है लेकिन धीरे से नहीं बल्कि कान के नीचे झन्ना दिया है।  पहलीबार पी एम मोदी ने दुनिया  में बनी भारत की  "सॉफ्ट स्टेट"वाली   छवि को तोडा है। पाकिस्तान की फौजी इंतजामिया की यह जीद थी कि कुलभूषण के बहाने वह भारत को आतंकवादी समर्थक देशों की लाइन…

सियासी समुद्रमंथन और स्वच्छ भारत अभियान

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भारतीय राजनीति मे समुद्रमंथन का दौर जारी है। अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ उन्ही के सबसे करीबी  मंत्री कपिल मिश्रा सत्याग्रह कर रहे है तो  कपिल मिश्रा के खिलाफ आप के विधायक संजीव झा धरना दे रहे हैं। अन्ना आंदोलन के कोख से पैदा हुए नवजात आन्दोनकारी भ्रष्टाचार मिटाते मिटाते खुद भ्रष्टाचार के दल दल में फंस गए हैं। ठीक वैसे ही जैसे जे पी की सम्पूर्ण क्रांति के  कोख से पैदा हुए आंदोलनकारियो में कइयों ने भ्रष्टाचार की ऐसी कंपनी बनायीं जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी मालामाल हो रहे हैं। जिस सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता को लेकर बिहार और उत्तर प्रदेश में राजनितिक आंदोलन चला वह कब सियासी पार्टी से प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में बदल गयी यह उसके शेयरहोल्डर भी नहीं समझ पाए। आज यू पी में एक भ्रस्टाचारी दूसरे भ्रष्टाचारी को बेपर्दा करने में लगे हैं।देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस आज भ्रष्टाचार को लेकर इतना विवश और लाचार है कि अपने तमाम वकील प्रवकताओ को दामाद और आलाकमान की  साख बचाने के लिए लगा दिया है।

 2014 में इसी सियासी और आर्थिक  भ्रष्टाचार के नाम पर नरेंद्र मोदी सत्ता में आये थे। सियासी समुद्रमंथन के दौर में द…

पीपली लाइव फ्रोम कश्मीर ...

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कश्मीर क्या सच में देश की सबसे बड़ी समस्या है ? क्या सचमुच कश्मीर के कुछ पथ्थरबाज नौजवानो ने मसले कश्मीर को ज्यादा पेचीदा बना दिया है ? या फिर इस देश के स्वच्छंद मीडिया ने कश्मीर को हॉट केक बना दिया है। देश के 200 से अधिक न्यूज़ चैनल्स से आती कश्मीर के कुछ इलाकों की खबरों ने पीपली लाइव को सार्थक बनाया है। इस दौर में पीपली लाइव के अपने अधिकार को सुनिश्चित करते हुए मीडिया हाउस ने सोशल मीडिया को धारदार बनाया है । मजमा यहाँ चूरन बेचने वाले भी लगा लेते हैं .... सड़क के किनारे क्रेन का करतब देखने भी देश के किसी भी कोने में 100 -200 लोग जुट जाते हैं। वहां न्यूज़ रूम से चीखती आवाजे और मौके पर खड़े रिपोर्टर का बीर रस से सराबोर ओजपूर्ण रिपोर्टिंग यह मानने के लिए विवस करता है कि देश और उसकी समस्या को सिर्फ टीवी वाले ही समझते हैं अगर इन्हे मौका मिले तो हर समस्या का समाधान वे चुटकी बजाते कर सकते हैं। यहाँ प्राइम टाइम एंकर और एक्सपर्टस का अलग रुतबा है। मीडिया हाउस में अब गेस्ट कोर्डिनेटर ही आज का एजेंडा तय करता है और यह एंगल और एजेंडा एडिटोरियल मीटिंग से नहीं बल्कि सोशल मीडिया के ट्रेंडिंग से तय होता ह…

यह कश्मीर हमारा है.. ,जहाँ अबतक 40,000 से ज्यादा जाने चली गयी हैं

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आदरणीय यशवंत सिन्हा जी ,
यह कश्मीर हमारा है..  ,जहाँ अबतक 40,000 (चालीस हजार ) से ज्यादा जाने चली गयी हैं. यह जान हिन्दुस्तानियो की गयी है यह जान पाकिस्तान से भेजे गए आतंकवादियों की गयी है ।इससे अलग  कई हजार जाने भारत -पाकिस्तान के बीच तीन जंग में भी गयी है। आप चाहे तो कह दे इतनी मौते सीरिया और इराक़ में महज एक वर्ष   में हुई है ।  कश्मीर का यह आंकड़ा पिछले 27 साल का है (होम मिनिंस्टरी के ताजा आंकड़े से खुलसा )।  हम यह भी कह सकते हैं दुनिया के और देशों में महज चंद  वर्षो में आतंकवाद ने 3 लाख से ज्यादा जाने ली हैं।  कश्मीर का आतंकवाद और दुनिया दूसरे मुल्को के खुनी जंग में काफी फ़र्क़ है। एक जम्हूरी मुल्क हिंदुस्तान अपने सनकी पड़ौसी के उन्मादी जनरलो का डंक वर्षो से  झेल रहा है जो सीधी लड़ाई लड़ नहीं सकता लेकिन ब्लीडिंग इंडिया बाय थाउजेंड्स कट्स से हमें लहुलहान कर रखा है।


 तो क्या हम सचमुच पाकिस्तान की साजिशो का सॉफ्ट टारगेट बन गए है या इस मुल्क की जम्हूरियत कश्मीर में पैर जमा नहीं पाई है ? इसलिए अब्दुल्लाह से   लेकर मुफ़्ती तक  ,लोन  ,गिलानी ,फ़ारूक़  ,मलिक भी हमारे चाचा बने हुए है ,कोई कहता है इसस…

कश्मीर मसला है.... या बकैती ?

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अमरनाथ यात्रा और कश्मीर में पथ्थरबाजी का क्या कोई सरोकार है ? कश्मीर में टूरिज्म के पीक सीजन का  बंद -हड़ताल से क्या कोई रिश्ता  है ? फिर हर साल यह पथ्थरबाजी अक्टूबर-नवंबर और अप्रैल -मई से क्यों तेज हो जाती है ? फिर मीडिया की ख़बरों में इनदिनों  इतनी उत्तेजना क्यों है ?,किसी के लिए कश्मीर टी आर पी है तो किसी के लिए सियासत का बड़ा एजेंडा ,किसी के लिए कारोबार तो किसी के लिए दुकान। सच मानिये इस देश में जितने एक्सपर्ट कश्मीर और पाकिस्तान मामले के है  .. उतने एक्सपर्ट अब मार्केट में बाल काटने वाले भी नहीं मिलेंगे ? तो क्या वाकई में कश्मीर मसला है.... या बकैती ? कश्मीर में पिछले 30 वर्षो से सियासत  का केंद्र रहे फ़ारूक़ अब्दुल्ला को भारत की सियासत में  बॉलीवुड स्टार गोविंदा माने तो शायद गलत नहीं होगा। महफ़िल देखकर डायलग बदलते है ,ओमर अब्दुल्लाह के दौर में महज एक  वर्ष में 117 मासूम पथ्थरबाजो के शाजिश के शिकार हुए तब वे कहते थे  आतंकवादियों ने  मासूमो को मोहरा बनाया था  आज "पथ्थरबाज अपने मिशन के लिए संघर्ष कर रहे है"।  सी एम् मेहबूबा तब विपक्ष की नेता थी और हिज़्बुल मुजेहिद्दीन के आतंकवादी…

कश्मीर में जम्हूरियत जिंदाबाद !

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जम्हूरियत जिंदाबाद ! फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ज़िंदाबाद के नारों के बीच फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने  श्रीनगर का एम पी चुनाव जीत लिया है। लेकिन 9 अप्रैल के चुनाव के दो चित्र देश के बुद्धिजीवियों के बीच बहस का मुद्दा बना हुआ है। ये जम्हूरियत जिंदाबाद है  कि बाप -बेटा दोनों अब्दुल्लाह पथ्थरवाजो का गुणगान करते रहे और मुल्क को कोसते रहे. ..   एकबार फिर वे देश के कानून/नीति  निर्माता बन गए हैं। लेकिन मीडिया और बुद्दिजीवियो के बीच दोनों  चित्रों पर अलग अलग राय दी जा रही है और केंद्र की सरकार को सामने रखकर अनर्गल शब्द गढ़े जा रहे है.  उसकी हकीकत को जानने की तनिक भी कोशिश नहीं  हुई नेता उपदेश दे रहे है ,बुद्धिजीवी सरकार को गरिया रहे रहे हैं क्योंकि यहाँ जम्हुर्रियत ज़िंदाबाद है !
दरअसल सेना की जीप पर एक पथ्थरबाज  को बाँध कर ले जाते हुए जो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है वह भी 9 अप्रैल का ही है ठीक उसी दिन  जिस दिन  सी आर पी एफ के जवानो पर पथ्थरवाजो के बेशर्म करतूत भी सामने आया था। बड़गाम के एक बूथ पर महज 9 आई टी बी पी के जवान और स्थानीय पुलिस मतदान प्रक्रिया बनाये रखने की जद्दोजेहद कर रहे थे ,लेकिन भारी तादाद म…

क्या कश्मीर भारत के हाथ से फिसल रहा है ?

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क्या कश्मीर के नौजवाब स्टोन ऐज में लौट गए हैं  ? क्या अलगाववादी ग्रुप और आतंकवादी  ही इन पथरवाज नौजवानो के आदर्श  हैं ? क्या पाकिस्तान ही इन गुस्साए नौजवानो का लक्ष्य है ? शायद नहीं !  फिर इनका मकसद क्या है ?श्रीनगर में कुछ सन्यासी सी आर पी एफ  के जवानों पर पथ्थरवाजो ने जिस कदर अशोभनीय हरकत की है उससे पूरा देश गुस्से में है। कमाल हसन से लेकर फरहान अख्तर तक गौतम गंभीर से लेकर वीरेंदर सेहबाग तक हर कोई इससे आहत है। लेकिन रियासत के दो पूर्व मुख्यमंत्री इन पथ्थरवाजो के साथ खड़े दिख रहे हैं। यानी एक तरफ जज्वात है तो दूसरी तरफ सियासत। लेकिन इस इस दौर में कश्मीर में सिर्फ जज्वात उफान पर है सियासत चाहे मुख्यधारा की पार्टी की हो या हुर्रियत की, बौनी साबित हुई है। क्या इन पथरवाजो के साथ ,एन सी और पी डी पी के लोग नहीं हैं ?
जज्बाती भाषण देश के  गृह मंत्री भी दे  रहे हैं क्योकि कानून व्यवस्था का मामला राज्य का है ,उसी जज्वात में कश्मीर का हर नेता अपने अपने कॉन्स्टिचुएंसी को सहला रहे है ,उसे भरमा रहे हैं। तो क्या कश्मीर भारत  हाथ से फिसल रहा है? मैं कहता हूँ ,यह दोगली बात वही कर रहे है जिन्होंने  कश्…

एक बार फिर लौट आओ कबीर

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अब बिजनौर के जोगीरामपुरा के लोगों ने गांव छोड़ने की धमकी दी है ,वजह सुनना चाहेंगे ? स्थानीय मंदिर पर लाउडस्पीकर बजाना सख्त मना है (जिला प्रशाशन के आदेशानुसार )।क्योंकि  बहुसंख्यक मुस्लिम गाँव में हिन्दू मंदिर पर लाउडस्पीकर बजने पर कुछ लोग खून खराबे पर उतर आते हैं  लेकिन ,स्थानीय मस्जिदों के ऊँचे गुम्बद पर बंधे लाउडस्पीकरों से प्रशासन को कोई परेशानी नहीं है। यह उस कबीर के देश में हो रहा जिसने कठ्ठमुल्लाओं को चुनौती देते हुए कहा करते थे "कंकर पत्थर जोड़ी के मस्जिद लई  बनाई ,तो चढ़ी मुल्ला बांग दे ,क्या बहरे हुए खुदाय। कबीर हिन्दुओ को भी कहते थे पत्थर पूजे हरी मिले तो मैं पुजू पहाड़ ....भक्ति और आस्था ,जाति  और मजहब में बटे समाज को आईना दिखाकर कबीर ने  भारतीय संस्कृति में भक्ति और मोक्ष के लिए सबको आसान रास्ता बताया। आजतक किसीने कबीर की जात और मजहब नहीं पूछा। आज कल  कुछ विद्वान पत्रकार और लेखक कहते हैं उन्हें बहुसंख्यकवाद पसंद नहीं हैं। मैं कहता हूँ  उन्हें सच बोलने का साहस नहीं है ,उनसे अच्छा  भाँट है जो चारणगीत को अपना रोजगार मानता है लेकिन विदवान होने का दम्भ नहीं भरता । 
धार्मिक आस…

एक बार फिर लौट आओ कबीर

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अब बिजनौर के जोगीरामपुरा के लोगों ने गांव छोड़ने की धमकी दी है ,वजह सुनना चाहेंगे ? स्थानीय मंदिर पर लाउडस्पीकर बजाना सख्त मना है (जिला प्रशाशन के आदेशानुसार )।क्योंकि  बहुसंख्यक मुस्लिम गाँव में हिन्दू मंदिर पर लाउडस्पीकर बजने पर कुछ लोग खून खराबे पर उतर आते हैं  लेकिन ,स्थानीय मस्जिदों के ऊँचे गुम्बद पर बंधे लाउडस्पीकरों से प्रशासन को कोई परेशानी नहीं है। यह उस कबीर के देश में हो रहा जिसने कठ्ठमुल्लाओं को चुनौती देते हुए कहा करते थे "कंकर पत्थर जोड़ी के मस्जिद लई  बनाई ,तो चढ़ी मुल्ला बांग दे ,क्या बहरे हुए खुदाय। कबीर हिन्दुओ को भी कहते थे पत्थर पूजे हरी मिले तो मैं पुजू पहाड़ ....भक्ति और आस्था ,जाति  और मजहब में बटे समाज को आईना दिखाकर कबीर ने  भारतीय संस्कृति में भक्ति और मोक्ष के लिए सबको आसान रास्ता बताया। आजतक किसीने कबीर की जात और मजहब नहीं पूछा। आज कल  कुछ विद्वान पत्रकार और लेखक कहते हैं उन्हें बहुसंख्यकवाद पसंद नहीं हैं। मैं कहता हूँ  उन्हें सच बोलने का साहस नहीं है ,उनसे अच्छा  भाँट है जो चारणगीत को अपना रोजगार मानता है लेकिन विदवान होने का दम्भ नहीं भरता । 
धार्मिक आस…

उत्तर प्रदेश एक राजनितिक प्रयोगशाला

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दीनदयाल उपाध्य जन्मशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में मनाये जाने वाला गरीब कल्याण वर्ष और नोटबंदी का क्या कोई ताल्लुक है  ? जरा सोचिये इंदिरा जी का बैंकों का राष्ट्रीकरण से  गरीबो का कोई सरोकार था क्या ? "गरीबी हटाओ" के इंदिरा जी का नारा क्या देश से गरीबी हटा पाया तो क्या पी एम मोदी का जनधन एकाउंट योजना गरीबों के एकाउंट में पैसा डाल पाया क्या ? शायद नहीं !लेकिन गरीबों का नाम लेकर इंदिरा जी और उनका परिवार वर्षों तक इस देश पर  शासन किया तो क्या पी एम मोदी भी चुनाव जीतने के लिए "गरीबी" का जबरदस्त मार्केटिंग कर रहे हैं ? भाई, आज भी गरीब और किसान की चर्चा तो सबसे ज्यादा राहुल बाबा करते हैं क्योंकि यह अबतक कांग्रेस का कॉपीराइट रहा ,फिर लोगों को उनकी बात पर यकीन क्यों नहीं हो रहा ?

 क्यों यू पी में समाजवाद और दलितवाद ,जातिवाद ,सम्प्रदायवाद का प्रयोग धरासायी हो गया है ? शायद इसलिए अब गरीब सहानुभूति नहीं चाहते वो सियासी लीडरों का एहसान नहीं चाहते। अगर एक्सप्रेस वे को अखिलेश अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं तो हर गरीब को पता है कि उनका पूरा खानदान आज रिअलिटी बिज़नस में क्यों अब्बल ह…

"सोच बदलेगा तो देश बदलेगा "

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उत्तर प्रदेश में जीत - हार की समीक्षा अभी होना बाकी है ,लेकिन ई वी एम मशीन पर हार का ठीकरा फोड़कर मायावती ने ठीक वैसी ही बात की है जैसी बात लाल कृष्ण आडवाणी ने 2004 में की थी। गोमती नदी के किनारे अपनी भव्य मूर्ति लगाकर मायावती ने लखनऊ में अपने को स्थापित जरूर कर लिया लेकिन इन वर्षों में सियासत में आये बदलाव को समझने में धोखा खा गयी। ऐसा ही धोखा बीजेपी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार अडवाणी जी ने खाया था। सोशल इंजिनयरिंग का फार्मूला अब जीत का सूत्र नहीं है। न ही उग्र राष्ट्रवाद से चुनाव  जीता  जा सकता है। काम बोलता है इसके लिए प्रचार की जरूरत नहीं है ,जैसे शाइनिंग इंडिया की चमक का प्रचार 2004 में लोगों को प्रभावित नहीं कर सका था । लोगों के दिल में उतरने के लिए आम लोगों से संवाद जरूरी है। आमलोगों की समस्या को समझना जरूरी है। राष्ट्रीय मुद्दे की चर्चा के बजाय पीएम मोदी ने उत्तर प्रदेश में स्थानीय मुद्दे को अपनी जन  सभा में उठाया ,पार्टी ने टिकट बटवारे में हर वर्ग का ध्यान रखा  .सबसे बड़ी बात यह थी कि हर आम और खास में मोदी यह यकीन दिलाने में कामयाब हुए हैं कि सोच बदलेगा तो देश बदलेगा। और यह सोच म…

भारतीय राजनीति में परिवार और उनके ब्रांड अब फीके पड़ने लगे हैं ?

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दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित कहती हैं राहुल गाँधी अभी पॉलिटिक्स में नौशिखुआ हैं ,उन्हें कुछ और समय दीजिये। लेकिन बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी अपने बेटे तेजस्वी को अब मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती हैं। वह दौर था जब लालू जी ने अपने घरेलु पत्नी को चाहा तो मुख्यमंत्री बना दिया ,राहुल गाँधी से कम उम्र में  उनके पिता राजीव गाँधी को  कांग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे योग्य माना। लेकिन आज क्या हो गया कि ओडिशा में ब्रांड बीजू धरासायी हो रहे है ,ब्रांड ठाकरे की हवा निकल रही है ,शरद पवार सही ठिकाना  तय नहीं कर पा रहे हैं। ब्रांड मुलायम को ब्रैंड अखिलेश ने  चुनौती देने की कोशिश की तो उसे मजबूरी में सहारे की जरूरत पड़  रही है।  मायावती हर चुनावी रैली में दुबारा पत्थर न लगाने की कसमे ले रही है। तो क्या भारतीय राजनीति में परिवार और उनके ब्रांड अब फीके पड़ने लगे हैं ?



 2014 ने भारतीय राजनीति को जो आईना दिखया था उसे सियासतदां आज भी झूठलाने की कोशिश कर रहे हैं। बिहार के चुनाव को आदर्श मानकर राजनितिक पंडित आज भी चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग को अहम् मानते हैं। ध्रुविकरण…

चुनावी संग्राम में कुछ दिन गुजारिये तो उत्तर प्रदेश में

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लोकतंत्र के महापर्व को देखना है तो कुछ दिन गुजारिये उत्तर प्रदेश में। यकीन मानिये भारत की इस शानदार छवि को टी वी स्टूडियो से नहीं देखा जा सकता क्योंकि इस दौर में यहाँ या तो एजेंडा चलता है या फिर शोर। आज हर कोई पूछ रहा है किस दल की बढ़त है,किसकी बन रही है सरकार। सिर्फ सवाल हैं ,उत्तर किसी के पास नहीं है।  क्योंकि ये उत्तर प्रदेश है यानी मिनी इंडिया। अहम् बात यह है कि करप्शन और बैमानी के लिए मशहूर उत्तर प्रदेश की पुलिस और प्रशासन इलेक्शन कमिशन के निज़ाम के अंदर आते ही अदभुत क्षमता  दिखा रहे है यानी निज़ाम सही हो तो तंत्र को संभलने में वक्त नहीं लगता । तीसरे चरण के चुनाव आते आते यहाँ हर दल दावा जीत का कर रहा है और पूरी ताकत लगा रखा है तो यकीन मानिये जंग के केंद्र में  सिर्फ नरेंद्र मोदी  है और जंग 2017 से भी आगे की है। 

पिछले कुछ वर्षो से चुनावी भाषणों का एजेंडा मोदी तय कर रहे है ,टीवी के विद्वान कहते है पी एम् मर्यादा लांघ रहे है ,लेकिन यह समझने की जरूरत है कि मोदी के भाषणों पर सपा ,बसपा और कांग्रेस से इतनी तीखी प्रतिक्रिया क्यों आ रही है । अगर चुनावी सभाओं में दो दिनों तक अपना बच्चा और गो…

अच्छे दिन ! आने वाले हैं .... कब, यह किसी ने नहीं पूछा

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अच्छे दिन ! आने वाले हैं .... कब, यह किसी ने नहीं पूछा। भलेमानुष एक दिन बदलने में 24 घंटे लगते हैं ,हालात बदलने में कुछ तो वक्त चाहिए। मेरे जैसा एक साधारण  व्यक्ति अच्छे दिन के लिए जीवन भर संघर्ष करता है फिर राहुल गाँधी ,लालू यादव ,अखिलेश ,मायावती जैसे नेता किस अच्छे दिन का उपहास कर रहे हैं। क्या जिन प्रयासों से इन लीडरों ने अपने लिए अच्छे दिन बनाये है.  यह  क्या आम आदमी के लिए संभव है ? यानी ईमानदारी की कमाई और व्यवस्था से अच्छे दिन लाने में कुछ तो वक्त लगेगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि अच्छे दिन का मतलब क्या है ? किसी के लिए अच्छे दिन का मतलब एक छोटे काम के लिए सरकारी दफ्तरों का चक्कर न लगाना पड़े ,किसी के लिए उसके बच्चो की शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त हो जाए ,किसी के लिए उन्हें रोजगार मिल जाये ,किसानों को खेत में पानी और खाद मिल जाए ,किसी बुजुर्ग को वक्त पर पेंशन मिल जाय ,स्कूल कालेज जाने वाली बेटिया निर्भीक घूम सके ,स्वास्थ्य  और सड़क यातायात आसान हो सके कचहरी /अदालत से जल्दी न्याय मिल जाय  ,हर तरफ कानून का राज हो .. अच्छे दिन की ये छोटी सूची है लेकिन यकीन मानिये इस सूची का सरोकार शायद…

सियासी फलसफा अब मोदी को केंद्र में रखकर ही गढ़ा जा सकता है

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यू पी तो झांकी है असली जंग तो अभी बाकी है। देश की सियासत में अचानक पाँच राज्यों का चुनाव इतना क्यों महत्वपूर्ण हो गया यह देश में बन रहे  नए समीकरण  रेखांकित करता है ।2017 को 2019 के प्रोमो में फ़ीट करने के लिए बाप बेटे में तलवार खिंची हुई है ,तो कही महागठबंधन दरक रहा है। तीसरा मोर्चा हो या सेक्युलर फ्रंट सियासी फलसफा मोदी को केंद्र में रखकर गढ़ा जा रहा है। यानी कही एक पार्टी में दो अध्यक्ष हैं ,तो कही असली और नकली के बीच जंग जारी है। सियासी पंडित फेंट रहे हैं ,यू पी में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन किसी  एक पार्टी के लिए आत्मघाती होगा ,तो कही इसे ऐतिहासिक बताकर राहुल गांधी को मोदी के बराबर खड़े करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन इसी कोशिश में केजरीवाल से लेकर नीतीश कुमार तक राष्ट्रीय नेतृत्व की अपनी कुशल छवि बनाने के लिए अपने मोहरे भी बदल रहे हैं।
पुरे साढ़े 4  साल तक साढ़े चार चीफ  मिनिस्टर का तोहमत अखिलेश ढोते रहे लेकिन अचानक उन्होंने कौन सी सियासी टॉनिक पी कि  वे न केवल पार्टी के सर्वे सर्वा बन गए बल्कि जिम्मेदार मुख्यमंत्री बन गए। यानी अखिलेश के पांच साल के प्रशासनिक क्षमता का …